मिजाज़ मेरा – हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
तुम गए तो सारा जहान गया जो तुम लौटे मिजाज़ मेरा वो न रहा। तुम बताओ आए तुम तो क्यो आए क्या मुझे बदल जाने के लिए या फिर से छोड़ जाने के लिए। पढ़िये दिल को छू जाने वाली यह कविता –
मौसम दर मौसम बदलते गए
पत्ते शाखो से बिछड़ते गए
एक राज की बात सीने में छुपा के रखी
दातों तले उंगली दबा के रखी
नगीने को अंगूठी में फंसा के रखी
और तख्त को खुला छोड़ दिया
इंतजार किया तुम्हारे आने का
और जो तुम ना आए
तो किया मैंने ये काम
आसमां में घर बना, छत खुला छोड़ दिया
फ़िर हुआ यूं
बादल मनचले घिर आए चारों तरफ़
रास्ता न सुझे, जाए तो जाए किस तरफ़
बड़ी बेचैनी रही बताएं तुम्हें किस कदर
फ़िर,
फ़िर तुम आए मगर जाने को वास्ते
मिजाज़ मेरा बदल जाने को वास्ते..
— ग़ाफ़िल
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