ये सावन भी बीत जाएगा… इंतेजार की प्रेम कविता । ग़ाफ़िल
इंतज़ार है हर बार की भांति की इस सावन में तुम आओगे और कहोगे अपने दिल की बात। मगर जैसे जैसे समय बीत रहा है लग रहा ये सावन भी बीत जाएगा और तुम आओगे या नहीं ! पढ़िये इस कविता में –
लरजते दरख़्त, पत्तियों की रवानी है
खुला आसमां बारिश की मनमानी है
परिंदों को अब अपने शहर को लौटना है
सफ़र की बातें सबको बतानी है
कि उस शहर में शाम होती कैसी है
समन्दर को भी अपनी प्यास बुझानी है
और तुम सुनो...एक दास्तां
जो मुझको सुनानी है;
कि, ये सावन भी बीत जाएगा
बीत जाएगा मिट जाएगा
मगर मित बन के जाएगा
आएगा अगले साल मगर
इस साल चला जाएगा
मैंने कह दी जो मुझे कहनी थी
तुम्हें अगर कहना है तो कह दो
कि! ये सावन भी बीत जाएगा..
— ग़ाफ़िल
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