उसे क्या पता – सामाजिक और आत्मचिंतन की हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
“उसे क्या पता” ग़ाफ़िल की एक मार्मिक हिन्दी कविता है जो व्यक्ति के आंतरिक संघर्ष, निर्णयों की उलझन और उस मौन पीड़ा को दर्शाती है जिसे दुनिया अक्सर समझ नहीं पाती। यहाँ मौसम केवल प्रकृति नहीं, बल्कि मन की स्थिति का प्रतीक है।
सैकड़ों सवालों में, उलझा
फैसलों की लड़ी में, सुलझा
मुक़द्दर की राह में, फिसला
उठने की चाह में, ठहरा
चारों ओर हैं, भ्रम का जाल
घिरा हुआ है, मोह का काल
उठती कलम है, तोड़ने की चाह में
सिहरती पहर हैं, मिटने की राह में
आंधियों की आवाज़ आती है ज़ोर से
कड़कते हैं बादल, डराने की होड़ से
हूँ एक कमरे में, सामने है एक मेज़
रखी हैं उस पर, एक कलम, एक पेज़
लिखता हूँ मैं अपनी उधेड़-बुन उसमें
शांत करता हूँ अपनी मन-जिज्ञासा जिसमें
आज का मौसम भी अजीब है
किसी की हँसी, तो किसी का दुःख है
बरसती है वो अपनी ही मस्ती में
उसे क्या पता—जहाँ ख़ुशी, वहीं तकलीफ़ है
— ग़ाफ़िल
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कविता – ‘उसे क्या पता’ का मर्म
“उसे क्या पता” केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे मौन संघर्ष की आवाज़ है। यह कविता बताती है कि हर व्यक्ति अपने भीतर सवालों, निर्णयों और अनकही पीड़ाओं का संसार लिए चलता है — जिसे दुनिया अक्सर नहीं देख पाती।
मौसम यहाँ प्रतीक बनकर सामने आता है। जैसे बारिश सब पर एक समान गिरती है, लेकिन हर किसी के लिए उसका अर्थ अलग होता है — ठीक वैसे ही जीवन की परिस्थितियाँ भी अलग-अलग मनों में अलग प्रभाव छोड़ती हैं।
ग़ाफ़िल की यह कविता हमें संवेदनशील बनने की सीख देती है — क्योंकि जो बाहर से शांत दिखता है, भीतर से वह तूफ़ानों से जूझ रहा हो सकता है।
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