पहली बार कब छुआ – प्रेम कविता । ग़ाफ़िल
प्रेम में जब हम शामिल होते है तो हर पल कुछ नया सा लगता है। पहली नज़र से लेकर पहली बार कब छुआ तक; सब जैसे मन – स्मृति में अंकित हो जाती है और जब याद आती है तो वो ऐसी सनसनाहट के साथ आती है जैसे वो ही हो। पढ़िये इस कविता में उसी छुअन और उसकी सनसनाहट को और महसूस कीजिए की उसने पहली बार कब छुआ था आपको –
तुमने मुझे पहली बार कब छुआ !!
मुझे याद नहीं,
मगर याद है तुम्हारे स्पर्श से उत्पन्न
सनसनाहट मेरी त्वचा पे
मुझे याद नहीं कि वो दिन कौन सा था
ना याद है महीना ना ही वो साल
मगर याद है वो अभी भी; जाने कैसे
मैं उस एहसास को याद करने नहीं जाता
ना ही उसके बारे में ख्याल ले आता
मगर जाने क्यों अचानक से मेरी व्यस्तता
तो कभी एकांत में
वो सनसनाहट एकदम से जीवंत हो जाती है
शायद मेरा मन तुम्हें अभी बरकरार रखना चाहता है
तभी तो ला देता है तुम्हें एकदम से मेरे सामने
कि तुम और तुम्हारी यादें बनी रहे
मुझे लगता है मैं तुम्हें अब तभी भूल पाउंगा
जब समाप्त हो जाएगी मेरी यादाश्त अचानक से
मगर मुझे शक है कि
क्या भूल पायेगी मेरी त्वचा उस सनसनाहट को !!
— ग़ाफ़िल
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