डरपोक मन – प्रेरणादायक हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
यह कविता एक डरपोक मन की दुविधा और असुरक्षा को उजागर करती है, जो दरिया में उतरने से पहले ही डूबने का डर महसूस करता है। यह रचना जोखिम से घबराते मन और अधूरी हिम्मत की सच्ची तस्वीर पेश करती है।
मैं हाल ए दरिया से खींच लाउंगा
वो मोती जो कीचड़ में सने होंगे
रूह कांप जाएगी कि सर्द है पानी
और हवाएं भी अपने उफान पे है
गहराई भी तो है और डूबने का डर भी
एक बार जा कर फ़िर वापस आना
क्या मालूम; संभव होगा कि भी नहीं
कि उसने आवाज़ भी तो दी है कि
बांध टूट गया है
सब कुछ लूट गया है
अगर जाने का इतना ही शौक़ है तो
अपने नाम का कफ़न छोड़ जाओ
वरना किसे पड़ी है तुम्हारे ना होने की
इतना क्या कम है कि तुम किनारे पर हो
ज़िन्दगी के सहारे पर हो
हल्क पे जब जान आएगी
तब असलियत नज़र आएगी
बड़ी बड़ी बातें तो मैं भी कर लेता हूं
नशे में हूं कुछ भी कह देता हूं
सुनो मेरी! अलाव जलाओं और बैठ जाओ
थोड़ी गर्माहट आ जाने दो
मोती कौन सा भाग रहा
ये दरिया कहां जा रहा
रात है अभी सुबह का इंतजार करो
मैं तो कहता हूं घर जा के आराम करो
कि मोती मिलना होगा तो मिल जाएगा
जो ना मिला तो मन ही तो है
कहीं और; किसी ओर लग ही जाएगा_
— ग़ाफ़िल
© All Rights Reserved
ग़ाफ़िल की अन्य बेहतरीन हिन्दी कविताएँ पढ़ने के लिए ☛ Hindi Poems Category पर जाएँ।