मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ..
कुछ दिनों से मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ। कोई बड़ी वजह नहीं, बस दिल थोड़ा थका हुआ है। खैरियत पूछी जाती है, मगर दिल की नहीं— और शायद इसी से ये पंक्तियाँ जन्म लेती हैं।
मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ इन दिनों से
तुम खैरियत पूछो
मगर गाफिल दिल की न पूछो
कि सब कुछ बिखेर के जो कुछ नहीं समेटा है
दर्द कुछ ऐसा है जो सोचता हूं क्या वो मेरा है
तमाम उम्र अभी कहां कटी है
सफ़र अभी अकेला है
सफ़र अभी अकेला है
जो है तुम्हारे पास कुछ वक्त
उस वक्त को निसार करो
जाओं कहीं और जाओ
मुझसे न प्यार करो
दिलों की बात दिलों को बताया करो
मगर मेरी जान! कुछ तो छुपाया करो
यूं तो ये मिजाज़ धधकती आग है
मगर इन दिनों कुछ उनके ख़्वाब है
जो ख़्वाबों में टूटो तो बिखर जाया करो
मेरी जान!
तुम खैरियत पूछो
मगर दिल की न पूछा करो
— ग़ाफ़िल
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मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ — कविता का मर्म
कभी-कभी हम खुद को ही समझ नहीं पाते। यही एहसास इस कविता का मूल है। मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ, पर यही मिजाज़ हमें इंसान बनाते हैं, हमारी संवेदनाओं को जिंदा रखते हैं।
हर शेर में छिपा दर्द, हर लफ्ज़ में बसी तन्हाई — ये सिर्फ़ महसूस करने वाले ही समझ सकते हैं।
इस कविता को पढ़ते हुए आपको अपने भीतर के छोटे-छोटे एहसास, टूटे-फूटे ख्वाब और अनकहे जज़्बात भी नजर आएंगे।
क्योंकि, सच यही है कि मिजाज़ अच्छे नहीं हैं कुछ, लेकिन इन्हीं एहसासों में हमारी नाजुकता, हमारी गहराई और हमारी असली इंसानियत छुपी है।
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