मगर आहिस्ते – हिन्दी प्रेम कविता । ग़ाफ़िल
मगर आहिस्ते है न ग़ाफ़िल! तुम्हें कैसे पता की मेरी इबादत, इनायत और नियत सब तुम पर फ़िदा है जो तुम कहते हो मांगों मगर –
तुम दीप जलाओ मगर आहिस्ते
बातें करों मुझसे मगर आहिस्ते
ताने बाने सब बुन डालो मेरे चारों तरफ मगर आहिस्ते
चलों; पायल की खन-खन करो मगर आहिस्ते
मेरी इबादत में खलल पड़ती है
मुझसे आंखें मिलाओं मगर आहिस्ते
नाचो; गाओ मौज करो मगर आहिस्ते
मेरी इबादत में खलल पड़ती है
मैं मांग रहा हूं रब से तुम्हें ग़ाफ़िल !!
तुम भी मांग लेना मुझे मगर आहिस्ते
मेरी इबादत में खलल पड़ती है_
— ग़ाफ़िल
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