हम आने को है.. हम आयेंगे.. – जीवंत हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
‘हम आने को है.. हम आयेंगे..’ यह रचना जीवन, प्रतीक्षा और परिवर्तन के दौर से गुजरती भावनाओं को शब्द देती है, जहाँ अँधेरा, संघर्ष और विश्वास साथ-साथ चलते हैं। कविता उम्मीद, टूटन और फिर से खिलने की प्रक्रिया को गहराई से सामने रखती है।
मुराद की मियाद खत्म होने को है
तुम तैयार हो ना, जंग होने को है
काफ़िरेे बंजारे संग होने को है
काफिलों में अलगाव होने को है
कहां तक ले गई है ज़िन्दगी
कहां तक ले के जाएगी
रात है थोड़ा सब्र करो
सवेरा होने को है
हो रात चांदनी या हो आमवस्या की
बात थोड़ी डरने को है
मेरी उम्र ले जाओ
मेरी दुआओं में असर होने को है
घट चितवन अब श्रृंगार कैसा
नशा सब उतरने को है
मिट्टी में अब तपिश है
बरसात होने को है
नमी फिज़ा में क्यों भटक रही
मेरी आंखों को उसकी जरूरत है
एक तरफ छांव तो दुजी ओर धूप है
मौसम बिगड़ने को है
सड़क है सुनी किनारे पर धूल है
नंगे पांव आना तुम
छाप अपनी छोड़ जाना तुम
तेरी निशानी रखने का मुझपे जुनून है
किस्मत में किस्मत नहीं
कहती मेरी लकीर है
बाजुओं में भर जाना तुम
होश ना सुकून है
एक दिन पल भर को आयेंगे
आते ही खो जायेंगे
लता बेल की मुरझा रही
ग्रीष्म ऋतु आ रही
हरे पान की चटक लाल रंग छोड़ जाएंगे
धुलने से भी ना धुल पाएंगे
अमरबेल की लता है हम
तेरे क़दमों में झुक जाएंगे
सूखे बीज की भांति हम
मिट्टी में दफ़न हो जाएंगे
तुम नीर से सींच देना
तेरे उपवन में खिल जाएंगे
हम आने को है.. हम आयेंगे..
— ग़ाफ़िल
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