दीवारों पर टंगी हुई – हिन्दी मार्मिक कविता । ग़ाफ़िल
जब अकेलेपन और कठिन प्रयासों के बाद सफलता मिलती है तो कुछ छीजे जेहन मे रह जाती है जैसे नज़रें टिक जाती है दीवारों पर टंगी हुई कुछ चीजों पे या उन एहसासों पे जो उस समय की साथी रहती है। प्रस्तुत कविता भी कुछ यही कहती है कि –
इस तरक्की के हो जाने के बाद
मैं एक नया घर ले लूंगा
उस घर में मेरा अलावा सिर्फ़
कुछ यादें रहेंगी
दीवारों पर टंगी हुई
दो दो बरस के अंतराल के बाद
घर की दीवारों पर रोगन लगवाऊंगा
ताकि वो हमेशा चमकती रहें
बची रहे धूमिल हो जाने से
और हर बार खींच लूंगा तस्वीर
पुराने रंग की,
इस जेहन में
अगली तरक्की के हो जाने तक
— ग़ाफ़िल
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