बातें मेरे प्रेम की – इज़हार ए दिल की कविता । ग़ाफ़िल
बातें मेरे प्रेम की; उस ज़बान में लिखी है जहाँ ख़याल उर्दू से आते हैं और एहसास हिन्दी में ठहर जाते हैं। यह प्रेम बोलता कम है, मगर हर मुस्कान, तड़पन और मर्यादा में अपनी मौजूदगी दर्ज करा देता है।
ख्याल उर्दू सा और बातें हिन्दी की
मज़हबी रंग में दिखे, रंग मेरे प्रेम की
गजब का भाषण और आवाज़ में रौब
मुस्कुराहट में दिखे, मुस्कान मेरे प्रेम की
अभिव्यक्ति विचारों की और क्रांति हो संग
उसकी बातों में दिखे, बातें मेरे प्रेम की
कोई खोया, कोई भटका और कोई बिछड़ा
एकांत देखे, मिलन मेरे प्रेम की
नटखट, चंचल चितवन और मधुर व्यवहार
स्वप्न में स्वप्न देखे, स्वप्न मेरे प्रेम की
एकाध बार जब बादल घिरे और बिजली कड़के जोरों की
बरसात देखे, अश्क मेरे प्रेम की
सब मर्यादित हो और जब लकीरें भी खींचे
तो नीव देखे, गहराई मेरे प्रेम की
खुमार छाए और जब उतर आए
तब आस देखे, तड़पन मेरे प्रेम की
वो जाने और पहचाने भी कि मैं उनके हिस्से में नहीं
फ़िर भी उनके जीवन के जायदाद पर हक दिखे मेरे प्रेम की
ऐसा कितनी बार हुआ है और होगा
वो लिखती नहीं 'गाफ़िल' मगर करें बातें मेरे प्रेम की
— ग़ाफ़िल
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