दो दिन बाद होली है – हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
चलो गाँव चले कि दो दिन बाद होली है। शहर तो बस जीने कमाने का जरिया है असली होली तो गाँव की होली है। चलो चलते है होली के बहाने गाँव और गाँव के बहाने होली में कुछ तो नया रंग दिखेगा; के भाव को बताती होली पे यह कविता जो कहती है कि –
दो दिन बाद होली है
मेरे शहर के लोग अपने गाँव जा रहे है
जैसे लोग जाते है किसी छुट्टी पे
चंद दिनों के लिए
कुछ लोग होली के दिन ही गाँव को निकल पायेंगे
यहाँ शहर में काम अटके पड़े है
उन्हें निपटाना भी तो है
कुछ पैसे कमाने भी तो है
हालाँकि पिछले कई सालों की भांति मैं नहीं जा रहा
अब तो अपना मकान है शहर में
सोचता हूँ सरकार को पत्र लिखूँ कि
वो सारे गाँव को पर्यटक स्थल में परिवर्तित कर दे
क्योंकि शहर के मुक़ाबले
गाँव का इतना हक तो बनता ही है॥
— ग़ाफ़िल
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