रात कुंवारी है – हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
यह कविता उम्मीद और बेचैनी के बीच झूलते मन की कोमल अवस्था को दर्शाती है। रात की लंबाई, सब्र का टूटना और हल्की-सी मुस्कान; इन सबके बीच रात कुंवारी है और दिल अब भी आस थामे है। यह रचना इंतज़ार, आशंका और उम्मीद की महीन भावनाओं को संवेदनशील अंदाज़ में प्रस्तुत करती है।
इस आस में ये सब्र टूट रही
रात कुंवारी है मगर कट रही
बेचैन इतने भी क्या ग़म जो ज्यादा है
हंसी रह रह के लबों पे तो आ रही
रुको! देखो जरा, चिड़िया सजर बदल रही
मोहब्बत में इधर से उधर हो रही
जो आया तूफ़ान तो देखा जाएगा
फ़िलहाल तो हवाएं रुख़ बदल रही
इस आस में ये सब्र टूट रही
रात कुंवारी है मगर कट रही
— ग़ाफ़िल
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