गुलाब जब खिलते है – दिल को छु लेने वाली प्रेम कविता । ग़ाफ़िल
कितनी अजीब कशमकश रहती है न जब हम नए नए जवान होते है जैसे गुलाब जब खिलते है। नई उमंग, नई चाहत और दुनिया को देखने का नया नजरिया। नया एहसास और नए प्रेम की तलाश की कहानी शुरू होती है। प्यार, अफसाने और गीतों का दौर चलता है। बहुत कुछ होता है तो आइये इस दिल छु लेनी वाली कविता में खो जाते है और महसूस करते है उसी दौर की उस जवानी की बातों को –
हुस्न के गुलाब जब खिलते है
इतराते है लरजते है
जब जब बयार बहकती है
पंखुड़ियां कोई बोल बोलती है
इस धरा की कोई सोखियां
होठों से कहीं मिलती है
हरारत जब आती है इस गुलशन में
ये जवां बदन मचलते है
गुमनामी का सीना चीर जैसे
बसंत में; दो दिल मिलते है
हुस्न के गुलाब जब खिलते है
दूर कहीं कोई फसाना लिख रहा होता है
ये प्यार सर चढ़ के बोल रहा होता है
इक इक पल फ़िर मुश्किल हाय! तौबा
जैसे सहरा बरस जाने का इंतज़ार करते है
भींगते बरसात में कोई आंचल संभाले होता है
क्या उसने कहा क्या उसने सुना, ये बात हर ओर करते है
मिट्टी पे फिसलन अचानक बढ़ जाती है
हौले हौले दबे पांव रखना होता है
कहीं माली घेरा न कर दे
संभल संभल के बढ़ते है
शरारते भी सूझबूझ भरी
उसे समझना होता है
दिल की बात आंखों से बयां
आंखों को ये समझते है
इस गर्दिश में तुम ना पड़ों
आते जाते हर दोष तुम्हारा होता है
बेचैनी समंदर सी गहरी
आंखों का पानी नमकीन करते है
इत्र फ़िर हवाओं में लिपट के आती है
हर सांस पे धड़कनों का हिसाब करते है
तब दूर कहीं कोई और गुलाब खिलते है
ये तमाशे तो हर रोज़ होते है
मैंने देखा है ग़ाफ़िल; तुम भी देखोगे
हुस्न के गुलाब जब खिलते है
इतराते है लरजते है
ओस की बूंदें बन
पंखुड़ियों से जा मिलते है
गुमनामी का सीना चीर जैसे
बसंत में; दो दिल मिलते है
हुस्न के गुलाब जब खिलते है_
— ग़ाफ़िल
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