ग़ैर मुल्क के होते – प्रेम विरह की कविता । ग़ाफ़िल
हूँ… कितना आसान और कितना मुश्किल हो सकता है प्रेम में विरह। सवाल है कि ग़ैर मुल्क के होते तो, शायद संभल भी जाते, मगर तुम तो अपने थे फिर भी ऐसा हो गया। किसकी गलती है मैं पूछता हूँ हर एक सवाल में तुमसे कि –
इश्क़ में फजीहत आसान है क्या
अपने मकां में कोई दूसरा आसान है क्या
कब तक ये जाहिर करें की होश में नहीं
दिल्लगी के साथ जीना आसान है क्या
तुमने तो कह दिया ये मेरे शहर का रोग नहीं
कहीं आबो हवा को रोकना आसान है क्या
ग़ैर मुल्क के होते तो बात समझ में आती
मगर इस दिल को समझाना आसान है क्या
मेरे ख़्वाबों से कहों कि तुमसे जुदा रहें
जुदाई में प्यार ना रहें आसान है क्या
मजीद बस तेरे सिवा और कौन है ग़ाफ़िल
सारी दुनिया को ठुकराना आसान है क्या_
— ग़ाफ़िल
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