लोग मुझे तलाशें
लोग मुझे तलाशें – है न कितनी बेगैरत बात, शायद स्वार्थ भी लग सकता है इस बात में। मगर लोग मुझे तलाशें – यह प्रश्न भी तो हो सकता है ख़ुद से, स्वंय के अस्तित्व से या इस का कुछ और भी अर्थ है जानिए इस कविता में –
मुझे अच्छे लोग पसन्द है लेकिन मैं अच्छा नहीं हूं
मुझे सच्चे लोग पसन्द है लेकिन मैं सच्चा नहीं हूं
चाहिए मुझे मीठी बोली औरों से
मगर मुझमें कड़वाहट बहुत है
चाहिए मुझे प्रेम किसी का
मगर मुझमें नफरत बहुत है
चाहिए मुझे साथ किसी का
मुझमें अकेलापन बहुत है
मुझे बहुत कुछ चाहिए
मगर मेरे पास देने को कुछ नहीं है
क्या तुम भी मेरे जैसे हो
अगर हां, तो मेरी तलाश जारी रहेगी
और शायद तुम्हारी भी
अगर तुम मुझ से उलट हो
तो मुझे तुम ख़ुद सा बना दो
ताकि लोग मुझे तलाशें
ना कि मैं तलाशुं कोई तुम सा..
— ग़ाफ़िल
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