बरसात इधर है_ दर्दभरी हिन्दी ग़ज़ल । ग़ाफ़िल
ग़ज़ल ‘बरसात इधर है’ इश्क़ की उस तिश्नगी का बयान है जो आँखों में ख़ुदा की मूरत बनकर बस जाती है। सादगी के पीछे छुपी प्यास और ख़ामोश दर्द को अल्फ़ाज़ों में ढालती ये पंक्तियाँ, मोहब्बत को बारिश की तरह बरसता हुआ महसूस कराती हैं।
मेरी आंखों की ताहिर में बसे उसकी जो सूरत है
लोग कहे मेरी इन आंखों में उस ख़ुदा की मूरत है..!!
मेरी आदतों में सादगी में कुछ तो बात है मगर
लोग कहां जाने मुझे कितनी प्यास है मगर..!!
मेरी तिश्नगी में तुम आओं मिलों कुछ इस कदर "गाफ़िल"
जब मैं रो पड़ूं तो लोग कह दे बरसात इधर है..!!
*शजर = वृक्ष *सहर = सवेरा *आरजू = अभिलाषा
*ताहिर = पवित्रता *तिश्नगी = चाहत
— ग़ाफ़िल
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