वो किसकी नजर – हिंदी इश्क़ ग़ज़ल । ग़ाफ़िल
पढ़िए ग़ाफ़िल की यह हिंदी इश्क़ ग़ज़ल — कभी कभी एक नज़र ही काफी होती है — और ज़िंदगी बदल जाती है। यह ग़ज़ल उस अजीब सी हलचल की बात करती है जो तब शुरू होती है जब कोई बिना कुछ कहे, बस अपनी मौजूदगी से दिल में उतर जाता है। आईने के सामने ज़्यादा वक्त बिताना, राहों में पलकें बिछाना, और यह सोचते रहना कि आखिर यह किसकी नज़र लग गई — यह एहसास बहुत आम है, मगर इसे शब्दों में कहना आसान नहीं होता।
इस ग़ज़ल में ग़ाफ़िल ने उस सीधी-सादी लड़की की कहानी लिखी है जो अचानक किसी की नज़र में आ जाती है — और फिर वो ख़ुद भी नहीं समझ पाती कि यह गफलत कहाँ से आ गई। इश्क़ की शुरुआत हमेशा ऐसे ही होती है — बिना बताए, बिना पूछे।
रोज़ रोज़ आईने की जरूरत आ पड़ी
वो किसकी नजर; है जो तुम पे आ पड़ी ॥
तालुकात इतनी है बढ़ रही
कि मिलने की नौबत आ पड़ी ॥
भोर से लगे हों राहों में पलकें बिछाए
क्या इन राहों से मोहब्बत आ पड़ी ॥
किसके इशारे से ये इश्क़ की चालें चली गई
सीधी सादी लड़की पे यूं गफलत आ पड़ी ॥
मिजाज़ में सादगी अदब में रोबाब है
जाने किस नूर की दुआ आ पड़ी ॥
मर्ज ए दिल में कुछ तो मांगा था उसने
हुआ यूं कि गाफिल की संगत आ पड़ी ॥
— ग़ाफ़िल
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