समय क्या है – दार्शनिक प्रेरणादायक हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
समय क्या है? क्या वह केवल चलता हुआ पहिया है, या हमारे अस्तित्व का आईना? “गाफ़िल” की यह कविता समय, चेतना और स्वयं की खोज पर एक गहन दृष्टि प्रस्तुत करती है।
“गाफ़िल” — समय क्या है…??
कहते हैं लोग कि पहिया है
जो निरंतर गतिमान है,
रुकता नहीं — बस आगे बढ़ता जाता है…
समय…
इतिहास, भूगोल, राजनीति,
अर्थ और विज्ञान —
सब का ज्ञाता है!!
समय…
कल, आज और परसों की परिपाटी है!!
या विचार की धुरी,
या ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु!!
या कोई पैमाना है
दो घटनाओं के मध्य विद्यमान
अंतराल को समझने के लिए!!
समय —
एक है, अनंत है, या शून्य;
शायद जो है भी… और नहीं भी!!
अंततः
इतनी-सी बात समझ में आई —
समय वास्तविकता में मैं है,
जितना मैं — उतना ही समय…
— ग़ाफ़िल
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समय क्या है — भावार्थ
इस कविता में कवि “ग़ाफ़िल” समय के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करता है। सामान्यतः लोग समय को एक चलते हुए पहिये की तरह मानते हैं, जो बिना रुके आगे बढ़ता रहता है। परंतु कवि के लिए समय केवल घड़ी की सुइयों का चलना नहीं है।
कवि कहता है कि समय इतिहास, भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र और विज्ञान — सबका साक्षी है। वह भूत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाली एक अदृश्य धुरी है। कभी वह दो घटनाओं के बीच का अंतराल है, तो कभी ब्रह्मांड के केंद्र जैसा व्यापक और अनंत।
अंत में कवि इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि समय कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य के भीतर ही विद्यमान है। जितना हमारा अस्तित्व है, उतना ही समय है। अर्थात् हमारा जीवन, हमारी चेतना और हमारा अनुभव ही समय को अर्थ देते हैं।
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