वो किसकी नजर..
यह ग़ज़ल नज़र, नूर और गफलत के उस लम्हे को पकड़ती है जहाँ सादगी भी इश्क़ बन जाती है। आईने से शुरू होकर संगत तक, हर शेर दिल की बढ़ती हलचल का गवाह है।
रोज़ रोज़ आईने की जरूरत आ पड़ी
वो किसकी नजर; है जो तुम पे आ पड़ी ॥
तालुकात इतनी है बढ़ रही
कि मिलने की नौबत आ पड़ी ॥
भोर से लगे हों राहों में पलकें बिछाए
क्या इन राहों से मोहब्बत आ पड़ी ॥
किसके इशारे से ये इश्क़ की चालें चली गई
सीधी सादी लड़की पे यूं गफलत आ पड़ी ॥
मिजाज़ में सादगी अदब में रोबाब है
जाने किस नूर की दुआ आ पड़ी ॥
मर्ज ए दिल में कुछ तो मांगा था उसने
हुआ यूं कि गाफिल की संगत आ पड़ी ॥
— ग़ाफ़िल
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