फ़िर क्यों उगेगी ?
इन पंक्तियों में ख़ामोशी भी सवाल करती है और इंतज़ार भी साँस लेता है। यह कविता टूटती उम्मीदों, कुचली दूब और फिर भी उग आने की ज़िद की कहानी है।
होश है ख़ामोश
इल्तिज़ा कुछ भी नहीं
मेरी ख़ुमारी मैं जो समझूं
क्या करूं मैं क्या करूं
तुम्हारी आंखों के वो जो मोती
बहे चले किस सफ़र को
आसान है क्या उम्र भर का इंतजार
मेरी सांसों तुम जो पूछो
बताएंगे क्या, ख़ामोश क्यों है
तुम आना तो आना संभल के
दूब उग आई है मिट्टी पे
जो वो कुचले जायेंगे
फ़िर क्यों उगेगी दूब मिट्टी पे
— ग़ाफ़िल
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