पाबंदी क्यों – स्त्री के सवालों को पूछती हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
पाबंदी क्यों? कितना अहम सवाल हो जाता है किसी लड़की के मन में जब वो अपने सपनों को जीने के लिए कोशिश करना तो दूर उसको सोचने बाहर से सवाल उठाया जाने लगता है। पाबंदी क्यों यह मार्मिक कविता समाज से एक स्त्री होने का नाते सवाल पूछता है कि –
नज़र ज़माने की
बातें भी ज़माने की
सिर्फ़ मुझ पर क्यों?
भरोसा नहीं तुम्हें अपने बेटों पर
सो पाबंदी मुझ पर क्यों?
मैं नहीं कहती कि किसकी नज़र कैसी है
फ़िर नज़र मुझ पर क्यों?
तुम उसकी उड़ान चाहते हो
पर मेरे पर कतरना क्यों?
पाबंदी मुझ पर लगाते हो
मगर मुझे तुम लगते हो कैद में क्यों?
सिर्फ़ नज़रिया बदल देने से बात नहीं बनेगी
उस नज़र का असर ना दिखे तो सिर्फ़ नज़रिया क्यों?
मेरे हाथों में भी है ताकत अपनी लकीरें बुनने की
तो फ़िर तुम्हारी लकीरें मेरी लकीरों पर क्यों?
बात इतनी सी है, जिन पाबंदियों में तुम मुझे महफूज़ समझते हो
वो ही पाबंदियां मुझे डराती क्यों?
ए ज़माना, तू इतना बता सिर्फ़
बिन गुनाह की मुझ पे पाबंदी क्यों?
— ग़ाफ़िल
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