काश! तुम मेरे होते
आमने-सामने की खिड़कियों के बीच अटके उस प्रेम की है जो देखा तो जाता है, जिया नहीं जा सका। हर “काश! तुम मेरे होते” में एक इच्छा है, और हर इच्छा में एक सपना—कि दो मकान कभी एक घर बन जाएँ। रौशनी-परछाई, बारिश, पायल और पर्दों के बहाने यह रचना अधूरी चाहत की हरकतों को सहेजती है।
एक शहर, एक मुहल्ला,
दो मकान,आमने सामने की दो खिड़कियां,
उस पर लटकते पर्दे, और पर्दे से झकांती दो निगाहें
काश! तुम मेरे होते
बुझती,जलती रौशनी में
एक अक्स की परछाई में
सुद बुद्ध खोना
काश! तुम मेरे होते
काश! तुम मेरे होते
तो ये कहता
की तेरी एक झलक पाने की हसरत इतनी है
शायद,जितनी मेरी ज़िन्दगी है
काश! तुम मेरे होते
तो ये कहता
रुक जाया करों
जब हम तुम्हें देखते है
की एक पल देख लेने के बाद
अगले ही पल, फ़िर से देखने की तलब लग जाती है
काश! तुम मेरे होते
तो ये कहता
की बारिश में,कभी आ जाया करो छत पर
और पानी में एक चिंगारी लगा दिया करों
की तेरे इंतज़ार में,पूरा बदन भींग जाता है
काश! तुम मेरे होते
तो ये कहता
की जब तुम पायल पहन कर नाचती हों
तो खिड़की खोल,पर्दे हटा दिया करों
काश! तुम मेरे होते
तो ये कहता
दो मकान को,एक घर बना दिया करों
दो मकान को, एक घर बना दिया करों
काश! तुम मेरे होते
— ग़ाफ़िल
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