औरत ही औरत की दुश्मन ? स्त्री शोषण और सामाजिक भ्रम
“औरत ही औरत की दुश्मन होती है” — यह जुमला जितनी सहजता से बोला जाता है, उतनी ही चालाकी से यह एक पूरे सामाजिक अपराध को ढक देता है। यह वाक्य स्त्रियों के बीच के टकराव को कारण बनाकर उस व्यवस्था को निर्दोष ठहराने का प्रयास करता है, जिसने सदियों से स्त्री को शोषण और चुप्पी के बीच जीने के लिए मजबूर किया है।
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इस जुमले के पीछे छुपा पुरुष प्रधान समाज का सबसे बड़ा छल
असल प्रश्न यह नहीं है कि स्त्री स्त्री के विरुद्ध क्यों खड़ी होती है, बल्कि यह है कि उसे ऐसा करने के लिए किसने, क्यों और किन परिस्थितियों में तैयार किया। कर्म प्रधान कहलाने वाले इस समाज में, स्त्री के कर्म का मूल्य क्यों गौण हो जाता है? क्या मात्र “जननी” कह देने से उसके प्रति हमारी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
स्त्री पर होने वाली हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती। अक्सर वह चारदीवारी के भीतर बिना किसी घाव के घटित होती है — ऐसी हिंसा, जो शरीर पर नहीं, बल्कि आत्मा पर निशान छोड़ती है। घर के भीतर यह मान लिया जाता है कि स्त्री की सुरक्षा पुरुषों की जिम्मेदारी है, और इसी तर्क की आड़ में उसी स्त्री को नियंत्रित, दबाया और चुप कराया जाता है।
कई बार स्त्री स्वयं इस व्यवस्था की ढाल बन जाती है — इस भ्रम में कि पुरुष की हाँ में हाँ मिलाने से, उसके पक्ष में खड़े रहने से, उसे समाज में थोड़ी बेहतर स्थिति मिल जाएगी। पर यही “थोड़ी बेहतर स्थिति” अगली स्त्री के लिए वही रास्ता तैयार करती है, जो इस समाज को पुरुष प्रधान बनाए रखने में सहायक रहा है।
“औरत ही औरत की दुश्मन” का विचार इसलिए भी बल पाता है क्योंकि पुरुषों द्वारा किए गए घृणात्मक कार्यों को, कहीं न कहीं, माँ, बहन या पत्नी के रूप में किसी स्त्री द्वारा ही बचाने की कोशिश की जाती है। परिणामस्वरूप दोष व्यवस्था का नहीं, स्त्री का माना जाता है।
बाहर यदि स्त्री पर पुरुष शोषण करता है, तो घर के भीतर वही पुरुष उसे दूसरे पुरुष से बचाने के नाम पर शोषित करता है। यह समझना आवश्यक है कि घर के अंदर होने वाला शोषण भले ही शारीरिक घाव न छोड़े, पर वही बाहर होने वाले शोषण की नींव बनता है।
इसलिए आवश्यकता किसी सतही सुधार की नहीं, बल्कि जड़ से बदलाव की है। कांटों को छाँटने से नहीं, बल्कि उस पौधे को उखाड़ने से, जो समाज को शोषक और शोषित में बाँटता है। यह बदलाव हर घर से शुरू होना चाहिए, क्योंकि चुप्पी भी अंततः उत्पीड़क की सहयोगी बन जाती है।
“औरत ही औरत की दुश्मन” की वास्तविकता को समझना और उजागर करना अनिवार्य है, ताकि कोई भी स्त्री किसी मृगतृष्णा में दूसरी स्त्री को अपमानित न करे, और कोई भी पुरुष अपने अपराधों से इस बहाने बच न पाए।
— ग़ाफ़िल
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