आधुनिकता और स्त्री शिक्षा । समानता या नया शोषण?
आधुनिकता ने स्त्री को शिक्षा तो दी, लेकिन उसे पुरुष के समकक्ष खड़ा करने से परहेज़ किया। यह एक असहज सत्य है कि स्त्री शिक्षा की शुरुआत समानता के उद्देश्य से नहीं, बल्कि स्त्री को पुरुष के लिए एक बेहतर गृहिणी, संगिनी और बच्चों की माँ बनाने के लिए की गई।
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बराबरी नहीं, जिम्मेदारियों का नया बोझ
संयुक्त परिवार से मूल परिवार की ओर बढ़ते समाज में, पत्नी के रूप में स्त्री पर अचानक कई नई जिम्मेदारियाँ आ पड़ीं—घर चलाना, बच्चों की परवरिश करना, पति को भावनात्मक सहारा देना और साथ ही “कुछ घर की, कुछ जग की” बातचीत में सक्षम होना। आधुनिकता के प्रवर्तकों ने इसे समाधान के रूप में स्त्री शिक्षा का नाम दिया, पर शिक्षा को अधिकार नहीं, आवश्यकता बनाकर प्रस्तुत किया।
स्त्री शिक्षा को नौकरी से कभी सीधा नहीं जोड़ा गया। हाँ, यह अवश्य माना गया कि स्त्री इतनी योग्य हो कि पति के न रहने की स्थिति में वह अपने बच्चों का पेट भर सके। नौकरी भी ऐसी हो, जो परिवार के प्रति उसके कर्तव्यों में बाधा न बने। स्पष्ट था—स्त्री काम कर सकती है, पर परिवार की कीमत पर नहीं।
इस सोच के परिणामस्वरूप एक नई अपेक्षा जन्मी: पढ़ी-लिखी स्त्री से यह उम्मीद की जाने लगी कि वह अपने बूते घर भी चलाए, बच्चों को भी पाले और साथ ही नौकरी भी करे। यह व्यवस्था स्त्री को सीमित स्वतंत्रता तो देती है, पर उस पर पहले से कहीं अधिक शोषण का भार डाल देती है।
आधुनिकता ने स्त्री को विकल्प तो दिए, पर अधिकार नहीं। उसे यह सिखाया गया कि वह “कर सकती है”, पर यह नहीं सिखाया गया कि वह “ना भी कह सकती है”। इस प्रकार स्वतंत्रता एक सहूलियत बनकर रह गई, अधिकार नहीं बन पाई।
यह प्रश्न इसलिए आवश्यक हो जाता है कि क्या यह आधुनिकता वास्तव में स्त्री को सशक्त कर रही है, या केवल उससे अधिक अपेक्षाएँ जोड़ रही है। जब तक शिक्षा और कार्य को स्त्री के अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी के रूप में देखा जाएगा, तब तक बराबरी का विचार अधूरा ही रहेगा।
— ग़ाफ़िल
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