कि ईश्वर है_ प्रेम आस्था की कविता । ग़ाफ़िल
कि ईश्वर है; को मानते हुए भी अगर हम उसकी इच्छा से अलग रास्ते ढूँढते हैं, तो सवाल ईश्वर पर नहीं, हमारी आस्था की सच्चाई पर उठता है। क्या विश्वास स्वीकार है, या सिर्फ़ परिणाम मिलने तक की प्रतीक्षा?
मगर सोचने वाली बात ये है कि
जब मैं मानता हूं कि ईश्वर है
और वो मुझे नहीं दे रहा जो मैं मांग रहा उससे
यानी वो चाह रहा कि मुझे वो चीज़ ना मिले
तो फ़िर मैं दूसरे तरीक़े से प्रपंज कर के
क्यों मांग रहा हूं।
क्या ईश्वर मेरा इतना नादान है, या फिर उसका भी व्यापार है।।
जब मानता हूं कि ईश्वर है
और मेरे मांगने से वो दिया या नहीं दिया।।
दिया तो ठीक;
अगर नहीं दिया तो क्या तथाकथित दूसरा रास्ता है ??
— ग़ाफ़िल
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