आधुनिक स्त्री: पहचान या सीमित स्वतंत्रता? स्त्री विमर्श
आधुनिकता ने स्त्री को क्या दिया—इस प्रश्न का ईमानदार मूल्यांकन किया जाए, तो दो बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं।
पहली यह कि स्त्री का एक स्वतंत्र वजूद है, उसकी अपनी पहचान है। इस तथ्य को स्वीकार करने में आधुनिकता ने कोई कटौती नहीं की।
दूसरी, और कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि क्या आधुनिकता वास्तव में स्त्री को “आधुनिक स्त्री” बनाने में सहयोगी है, या केवल उसे ऐसा महसूस कराने तक ही सीमित है।
यह लेख “अबला नारी नहीं, राष्ट्र-निर्मात्री स्त्री” श्रृंखला का तीसरा भाग है। अन्य भाग पढ़ें।
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आज़ादी के एहसास और अधिकार के बीच खड़ी स्त्री
गहराई से देखें तो यह समझने में कठिनाई नहीं होती कि आधुनिकता और पुरुष प्रधान व्यवस्था ने स्त्री को अपना वजूद खोजने का अवसर तो दिया, लेकिन उस पर कई शर्तें भी लगा दीं। स्त्री शिक्षा प्राप्त कर सकती है, अपने मनपसंद कार्य चुन सकती है—पर तभी, जब पुरुष इसकी अनुमति दे, या जब परिस्थितियाँ पुरुष को विवश कर दें।
दूसरे शब्दों में कहें तो स्त्री को मिली यह स्वतंत्रता अधिकार नहीं, बल्कि एक आपातकालीन व्यवस्था की तरह है—एक ऐसा विकल्प, जिसे तभी स्वीकार्य माना जाता है जब उसके पास कोई और रास्ता न बचे। यह स्वतंत्रता सम्मान के साथ नहीं, बल्कि लाचारी के साथ जुड़ी हुई है।
फिर भी, इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ स्त्रियों ने इसी सीमित स्वतंत्रता के भीतर अपने लिए रास्ते बनाए हैं। उन्होंने न केवल स्वयं को आगे बढ़ाया, बल्कि अन्य स्त्रियों के लिए भी दिशा निर्धारित की। इन स्त्रियों ने पुरुष प्रधान समाज को धीरे-धीरे मनुष्य-प्रधान समाज में बदलने की प्रक्रिया शुरू की है।
यह भी समझना ज़रूरी है कि हर बड़े बदलाव की शुरुआत सीमित दायरे से ही होती है। पर अब समय आ गया है कि इस बदलाव को वृहत रूप दिया जाए। समानता को अपवाद नहीं, सामान्य स्थिति बनाया जाए।
और यह बदलाव किसी आंदोलन से नहीं, बल्कि घर से शुरू हो सकता है। क्योंकि पहला चिराग़ अपने घर में जलेगा, तभी उसका उजाला दूसरों तक पहुँचेगा। स्त्री की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी पूर्ण होगा, जब उसे एहसास नहीं, बल्कि अधिकार प्राप्त होगा।
— ग़ाफ़िल
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