अबला नारी नहीं, राष्ट्र-निर्मात्री स्त्री
भारत में जब तक स्त्रियाँ सांसारिक, धार्मिक और राजनीतिक जीवन में उसी स्तर पर भागीदारी नहीं करतीं, जिस स्तर पर पुरुष करते हैं, तब तक किसी भी “भारत-भाग्योदय” की कल्पना अधूरी ही रहेगी। यह केवल एक विचार नहीं, बल्कि समाज की वास्तविकता का आईना है।
स्त्री की आंतरिक शक्ति और पुरुष प्रधान समाज का सबसे बड़ा भ्रम
“अबला नारी” — यह शब्द जितना प्रचलित है, उतना ही खतरनाक भी। स्त्री को अबला कहकर संबोधित करना दरअसल उस अज्ञानता का प्रदर्शन है, जो उसकी आंतरिक शक्ति, साहस और निर्णय-क्षमता को पहचानने से इनकार करती है। स्त्री केवल करुणा की पात्र नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो अपनी एक दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी देश की रूपरेखा बदल सकती है।
समस्या स्त्री की क्षमता में नहीं, बल्कि उस समाज की सोच में है जो स्वयं को पुरुष प्रधान कहकर गौरवान्वित महसूस करता है। यह समाज स्त्री को तभी स्वीकार करता है जब वह सीमाओं में रहे, चुप रहे, और बराबरी की मांग को विद्रोह समझा जाए। जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत है — स्त्री की उन्नति पुरुषत्व की बर्बादी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक उन्नति है।
एक स्वस्थ समाज वही होता है जहाँ स्त्री और पुरुष प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहयात्री हों। जहाँ स्त्री को आगे बढ़ने के लिए किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता न हो, और उसकी प्रगति को किसी के अहंकार से नहीं जोड़ा जाए। जब तक यह सहज सत्य स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक बराबरी केवल संविधान की किताबों में सिमटी रहेगी।
आज आवश्यकता किसी क्रांति की नहीं, बल्कि स्वीकार्यता की है — इस तथ्य को स्वीकार करने की कि स्त्री पुरुष के समकक्ष है। न उससे कम, न उससे अधिक। उसकी स्वतंत्रता किसी पर कृपा नहीं, बल्कि उसका अधिकार है। और जिस दिन यह समाज इस सच्चाई को आत्मसात कर लेगा, उसी दिन “अबला नारी” जैसे शब्द इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में गिने जाएँगे।
— ग़ाफ़िल
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