तुम ना मिलती तो – एहसास की हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
उस उपस्थिति की कहानी है ‘तुम ना मिलती तो’ जिसने शब्दों को केवल कविता नहीं, दिशा दी। जिस प्रेम ने प्रकृति को देखने का नज़रिया बदला और बहती नदियों में भी इंतज़ार का अर्थ भर दिया। यह रचना प्रेम के बहाने ख़ुद को पहचानने, गहराइयों तक पहुँचने और कवि के जीवन को नए सिरे से जीने की स्वीकृति है।
तुम ना मिलती तो
ना मिलता मेरी कविताओं को वो रूप
जो आज है
जिसमें हो कर बहती है जाने कितनी धाराएं
जो दूर से देखने पर अलग थलग जान पड़ती है
मगर करीब से देखो तो एक सी लगती है
तुम ना मिलती तो
मैं लिखता, और लिखता रहा प्रकृति के बारे में
उसके नियमों और घटनाओं के बारे में
तुम ना मिलती तो
कभी नहीं लिख पाता
प्रकृति के प्रेम को
मन उल्लास में बसे उसके रूप को
तुम ना मिलती तो
शायद कभी ये जान ही नहीं पाता
कि जो नदी बहती है
ऊपर से नीचे की ओर
वो सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण के नियम के तहत नहीं
बल्कि बहती है साथ में
उस प्रेम के लिए
जिसके इंतजार में हज़ारों पलकें बिछी रहती है
टिमटिमाते तारों की तरह
बेहतर जीवन की शुरुआत के लिए
तुम ना मिलती तो
क्या लिखता उस गहराई को
जो बहुत दूर तलक पहुंचती है
हजारों श्रोताओं के बीच में
और वहां से मुझ तक पहुंचती है जब
तालियों की गड़गड़ाहट में
नम आंखों की लहरों पे सवार होकर
तुम ना मिलती तो
क्या ख़ुद को इतना जान पाता
जितना आज जानता हूं
तुम ना मिलती तो
क्या वैसे जी पाता
जैसे आज जीता हूं_
— ग़ाफ़िल
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