ये झांकती खिड़कियां !! प्रेम कविता । ग़ाफ़िल
ये झांकती खिड़कियां कविता खिड़कियों के बहाने नज़र, एहसास और आज़ादी की उन हल्की-सी हरकतों को पकड़ती है जो रोज़ दिखती हैं पर महसूस कम होती हैं। खुलना-बंद होना, झांकना-छुपाना – ये झांकती खिड़कियां यहाँ दिल की एक अलग दुनिया है।
बस इस ओर से उस ओर ये झांकती खिड़कियां
नज़रों से दिल में उतर आती खिड़कियां
जब बरसा लेती हल्की अंगड़ाइयां
झट पट खुल जाती खिड़कियां
जो जोरों की हवा चले
खड़खड़ाती खिड़कियां
सूरज की किरणों को छांट के
कमरे में बिखेर जाती खिड़कियां
सुबह सुबह जब आलस आए
तो बुलाती खिड़कियां
कहीं हो शोर कहीं हो उल्लास
देखने चली आती खिड़कियां
दूर से देखो तो छोटी
पास बड़ी; नज़र आती खिड़कियां
इधर उधर लटके दो पर्दे
इन पदों से सज जाती खिड़कियां
कहीं किसी अमरबेल को
ख़ुद से लिपटा लेती खिड़कियां
दो दिलों का राज
छुपाती खिड़कियां
बातें अगर प्रेम की हो
बंद हो जाती खिड़कियां
सुबह शाम खुल जाती खिड़कियां
दोपहर आराम फरमाती खिड़कियां
रात में मचल जाती खिड़कियां
चांद को बुलाती खिड़कियां
मैंने देखा अपनी खिड़की से
क्या नज़र आती खिड़कियां
रूप रंग में अलग अलग
ख़ास नज़र आती खिड़कियां
मेरी नजर से जो मैं देखूं
उसे नज़र बनाती खिड़कियां
कहीं प्रेम कहीं जलन
कहीं आजादी कहीं गुलामी
जाने कितने रंगों में
रंग जाती खिड़कियां
मेरी खिड़की से उस खिड़की पर
और दो नज़र आती खिड़कियां
उन पर काजल का पहरा
दिन रात बैठाती खिड़कियां
जो मैं देखूं अपनी खिड़की से
देर तलक इठलाती खिड़कियां
इशारों इशारों में
बातें कर जाती खिड़कियां
मेरी खिड़कियों में झांक
अपना मुझे बनाती खिड़कियां
— ग़ाफ़िल
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