क्या संसार दु:खों का संसार है? जीवन जीने के तरीके की सच्चाई
क्या सच में संसार दु:खों का संसार है है या दुःख हमारे जीवन जीने के तरीके में है? एक गहन दार्शनिक आत्मचिंतन।
संसार दु:खों का संसार है!?
बात थोड़ी अटपटी है। क्या सच में संसार दु:खों का संसार है ? या संसारी लोग स्वयं में दुःख है।
मालूम चलता है कि दुःख संसार में नहीं व्यक्ति के जीवन जीने में है। दुःख तो है ही नहीं बस जीने का तरीका जो तुम्हारा है वही दुःख है अन्यथा संसार में तो हर्ष, उल्लास और उमंग की नावें चलती है। तुम उस नाव पे सवार होते नहीं और हो भी जाते हो तो तुम्हारे जीवन जीने का ढंग ऐसा है कि उस नाव पे भी तुम्हे दुःख ही दुःख दिखाई पड़ता है, इसलिए तो तुम कहते हो; मानते हो कि संसार दु:खों का संसार है।
मैं कहता हूं नहीं। संसार तो जीवंत है तुम उदासीन हो। और उदासीन व्यक्ति के जीवन में दुःख नहीं तो क्या होगा। दुःख तुम्हे नर्क समान लगता है तभी तो तुम स्वर्ग की आशा में रहते हो। जीवन जीते हो दुःख की तरह और कल्पना स्वर्ग की, इससे भी बड़ा कोई दुःख है। तभी तो ये बात भी प्रामाणिक लगती है कि संसार दु:खों का संसार है; लेकिन वास्तविक में तुम ही दुःख हो तुम्हारा जीवन जीने का तरीका ही दुःख है।
तरीका बदलो, दुःख को पहचानो उसे बांधों नहीं। फ़िर क्या दुःख क्या नर्क और क्या स्वर्ग।
— ग़ाफ़िल
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