पत्थर के ख़्वाब – प्रेरणादायक हिन्दी कविता । ग़ाफ़िल
“पत्थर के ख़्वाब” एक प्रेरणादायक हिन्दी कविता है जो इंसान की महत्वाकांक्षा, संघर्ष और आत्मचिंतन की कहानी कहती है। यह कविता दिखाती है कि सपनों की तलाश में हम कब खुद को ही बेजान बना लेते हैं।
सलीके से तोड़े हैं पत्थर के ख़्वाब कई,
मूरत की तलाश में, ख़ुद बेजान हो गए !!
बहारों में फूल खिले ताज़ी-ताज़ी,
बागों के मालिक, भौरों से परेशान हो गए !!
सोहबत में कई दिन बिताए और बिताई कई रातें,
मंज़िल पे आते-आते मेहमान हो गए !!
ज्ञान की गहराई में गोते पे गोते लगाए,
कमाई की खातिर ग़ुलाम हो गए !!
"ग़ाफ़िल" देर होती तो बात समझ में आती,
सौ साल की ज़िंदगी — अभी ही हैरान हो गए !!
— ग़ाफ़िल
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जीवन की दौड़ में इंसान कब बेजान हो जाता है?
यह प्रेरणादायक हिन्दी कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने सपनों की मूरत बनाते-बनाते खुद को ही पत्थर बना रहे हैं।
महत्वाकांक्षा और कमाई की दौड़ में कहीं इंसानियत तो पीछे नहीं छूट रही?
“पत्थर के ख़्वाब” जीवन की इसी सच्चाई को सादगी से प्रस्तुत करती है।
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